VARDAAN LEARNING INSTITUTE | POWERED BY VARDAAN COMET

मातृभूमि का मान

ICSE Class 10 Hindi • Ekanki Sanchay (Plays) • Chapter 3

matri bhoomi ka man

एकांकी का सारांश (Summary):

'मातृभूमि का मान' श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित एक ऐतिहासिक (Historical) एकांकी है। यह एकांकी राजस्थान (राजपूताना) के इतिहास की एक प्रसिद्ध घटना पर आधारित है। इसमें मेवाड़ के महाराणा लाखा और बूँदी (हाड़ा राजपूतों की रियासत) के वीर योद्धा वीरसिंह के बीच हुए संघर्ष का वर्णन है। एकांकी यह संदेश देती है कि अपनी मातृभूमि (चाहे वह छोटी हो या बड़ी) का सम्मान (मान) हर एक व्यक्ति के लिए अपने प्राणों से भी अधिक प्यारा होना चाहिए।

1. एकांकीकार का परिचय (Author Introduction)

रचनाकार: हरिकृष्ण 'प्रेमी' (Harikrishna 'Premi')

हरिकृष्ण प्रेमी हिंदी के एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटककार हैं। उनके नाटकों में राष्ट्रीयता, देशभक्ति और भारतीय इतिहास के गौरवशाली पलों का मार्मिक चित्रण मिलता है। उनके पात्र वीर, स्वाभिमानी और आदर्शवादी होते हैं जो मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे देते हैं।

2. एकांकी के मुख्य पात्र (Main Characters)

3. एकांकी की प्रमुख घटनाएँ (Key Events)

4. महत्वपूर्ण कथन (Important Quotes)

"हम राजपूत हैं, हमारी नस-नस में वीरभूमि का रक्त बहता है। हम मातृभूमि के अपमान को कभी सहन नहीं कर सकते, चाहे वह अपमान असली हो या नकली।"

= वीरसिंह का यह कथन उसके असीम देशप्रेम और सर्वोच्च स्वाभिमान को दर्शाता है।

"राजपूतों! हम सब एक हैं, फिर आपस में लड़कर अपनी शक्ति क्यों नष्ट करते हो?"

= चारणी का यह गीत राजपूतों में एकता स्थापित करने का संदेश देता है।

5. एकांकी का उद्देश्य (Theme)

matri bhoomi gate defense

6. परीक्षा उपयोगी प्रश्न-उत्तर (Practice Zone)

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: महाराणा लाखा ने क्या प्रतिज्ञा की थी और क्यों?

उत्तर: मेवाड़ के महाराणा लाखा अपनी शक्ति के घमंड में पूरे राजपूताने को अपने अधीन करना चाहते थे। जब छोटी-सी रियासत 'बूँदी' के राव हेमू ने उनकी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया, तो लाखा ने उन पर हमला कर दिया। परंतु इस युद्ध में महाराणा लाखा की सेना हार गई और उन्हें भागना पड़ा। इस घोर अपमान से आगबबूला होकर महाराणा लाखा ने यह कठोर प्रतिज्ञा ली कि "जब तक मैं बूँदी के दुर्ग (क़िले) को मिट्टी में मिलाकर ध्वस्त नहीं कर दूँगा, तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।"


प्रश्न 2: बूँदी का नकली दुर्ग क्यों बनाया गया?

उत्तर: महाराणा लाखा ने बिना अन्न-जल के बूँदी के क़िले को तोड़ने की प्रतिज्ञा कर ली थी। लेकिन असली बूँदी क़िले को जीतना आसान नहीं था और इसमें महीनों लग सकते थे, जिससे भूखे-प्यासे महाराणा की जान जा सकती थी। महाराणा के प्राणों की रक्षा करने और उनकी झूठी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए सेनापति अभयसिंह ने चित्तौड़ के मैदान में ही मिट्टी का एक 'नकली बूँदी दुर्ग' बनवाया, ताकि महाराणा उसे आसानी से तोड़कर अपनी कसम पूरी कर सकें और अपना उपवास तोड़ सकें।


प्रश्न 3: वीरसिंह ने नकली दुर्ग की रक्षा के लिए अपने प्राण क्यों दे दिए?

उत्तर: वीरसिंह मेवाड़ की सेना में सैनिक था लेकिन उसकी मातृभूमि (जन्मस्थान) 'बूँदी' थी। जब उसे पता चला कि मेवाड़ के लोग उसकी मातृभूमि का मज़ाक उड़ाने के लिए उसका नकली क़िला बना रहे हैं, तो उसका स्वाभिमान और देशप्रेम जाग उठा। वीरसिंह का मानना था कि "मातृभूमि का प्रतीक (चाहे नकली ही क्यों न हो) अपनी असली मातृभूमि के समान ही पूजनीय है।" वह जीते-जी अपनी जन्मभूमि का झूठा अपमान भी नहीं सह सकता था। इसलिए उसने महाराणा की सेना से बगावत करके, अपने कुछ हाड़ा साथियों के साथ उस मिट्टी के क़िले की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का महान बलिदान दे दिया।